जब चीजें हमारे अनुकूल तथा हमारी मान्यताओं को चुनौती नहीं देती हैं तो वह जानी पहचानी या परिचित महसूस होती है । हम अपने आस पास के वातावरण को  नियंत्रित करने के लिए जीवन की ड्राइवर सीट लेना पसंद करते हैं। हम अपने स्वयं के विश्वासों के एक भंवरजाल में रहना पसंद करते हैं ताकि हमें सहज महसूस हो सके और वास्तविकता के निकट लाने वाले अन्य सभी संभावित साधनों को अनदेखा किया जा सके। अधिकांश शिक्षित लोग उनकी मानसिकता को चुनौती देने पर सबसे अधिक तर्कहीन हो जाते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति को जगा सकते हैं जो वास्तव में सो रहा हो न की सोने का नाटक कर रहा है।

मानसिकता पर वास्तविकता की बजाय भावनाएं क्यों प्रभावी होती है  ?

हम अपने जीवन को तनाव मुक्त बनाने के लिए अपनी मानसिकता से संघर्ष करते रहते हैं यह हमारी रोजमर्रा की लड़ाई है। तनाव का कारण कुछ भी हो सकता है जैसे थका देने वाला कार्य , वित्तीय असुरक्षा, स्वास्थ्य का मुद्दा या डाँवाडोल निजी संबंध, वो सब कुछ भी जो आपके ऊपर उच्च अपेक्षा रखता है वह हमारे लिए तनावपूर्ण हो सकता यह हमारी वास्तविक क्षमता को कम कर है। आइए समझते हैं कि तथ्य हमारी मानसिकता को क्यों नहीं बदलते हैं और इस लेख में इसे बदलने वाले कारकों की गतिशीलता का पता लगाते हैं।

विश्वास के पीछे तर्क का गणित

दैनिक जीवन में हमारे कार्य किसी भी तर्क से अधिक हमारी विश्वास प्रणाली से प्रेरित होते है । यदि व्यक्तिगत तर्क व्यापक रूप से स्वीकार सामाजिक विश्वास से अलग है, तो जीवन में निराशा की एक बड़ी संभावना होती है और परेशानी-रहित कार्य करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

यह आवश्यक नहीं है कि आम धारणा का पालन करना हमेशा सच्चाई का अनुसरण होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं समाज में प्रचलित अवधारणाओं के अनुसरण करके हम अपने आपको समाज का अभिन्न अंग बनानाचाहते हैं। जिज्ञासा हमें प्रगतिशील बनाती है और जिसके लिए हम हमेशा सच्चाई के पीछे भागते हैं साथ ही साथ सामाजिक का हिस्सा बने रहने के लिए अवधारणाओं को भी जीवन का अंग बना लेते है आम तौर पर सच्चाई तथा सामाजिक अवधारणा बिना किसी परेशानी के काम करता है लेकिन कभी-कभी दोनों में संघर्ष की सम्भवनाएँ भी बन जाती है।

संघर्ष की स्थिति में किसी विशेष तथ्य या विचार की सच्चाई के पीछे भागने की तुलना में सामाजिक अवधारणा को स्वीकार करना बहुत सुविधाजनक होता है। जब हम सामाजिक अवधारणा प्रणाली को स्वीकार करते हैं तो हम कुछेक सत्य चाहने वालों के बजाय बड़े समूह द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।

हम हमेशा चीजों को स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सही हैं। कभी-कभी हम चीजों पर विश्वास करते हैं हम अपने चाहने वालो को अच्छे लगे।

इवान पावलोव का प्रसिद्ध संज्ञानात्मक विज्ञान का प्रयोग इस तथ्य को बहुत अच्छी तरह से समझाता हैं, यदि कोई यह अनुमान लगाता है कि वह किसी विशेष विश्वास प्रणाली अथवा तथ्य को अपनाने के लिए पुरस्कृत किया जाएगा, तो ऐसा करने के लिए वह पूरी तरह से खुश है और इसकी बहुत परवाह नहीं करता है कि इनाम कहाँ से आता है। शुरू में जब वैज्ञानिक ने रिंगिंग बेल के साथ कुत्ते को भोजन देना शुरू किया तो कुत्ते ने इस तथ्य को भोजन से जोड़ लिया अब कुत्ते के लिए घंटी बजने का अर्थ भोजन है। ठीक इसी प्रकार से मानव ने अपने लंबे इतिहास में खुद को इस तरह प्रशिक्षित किया है कि एक सामाजिक विश्वास की स्वीकृति को अधिक दोस्तों के साथ द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा।

मनुष्य की कमजोरी क्या है ?

सामाजिक जीव के रूप में हम सभी को प्यार, स्नेह और देखभाल की आवश्यकता है चाहे वह स्वाभाविक रूप से आता हो या हम उसके लिए कोई जोड़तोड़ का सहारा लेते हों। भावनाएं हमारी मानसिकता को बदलने वाले प्रमुख कारक हैं।

इसे समझने के लिए आइए भारत के सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत की मदद लें। कर्ण एक उत्कृष्ट धनुर्धर था और संभवतः कोई भी प्रतिद्वंद्वी उसके युद्ध कौशल के सामने नतमष्तक बना सकता था, लेकिन वह समाज में अपनी निम्न जाति के वंश के कारण एक योद्धा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया था। इसलिए जब कर्ण ने सार्वजनिक रूप से अर्जुन को अपने वर्चस्व को साबित करने के लिए चुनौती दी और अपने साथ युद्ध करके अपनी श्रेष्ठता को साबित के लिए खा तो दुर्योधन के अलावा किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। दुर्योधन द्वारा स्वीकृति के एक छोटे से निर्णय ने कर्ण को दुर्योधन से जीवन भर जोड़ दिया जबकि वह यह जानता था की दुर्योधन का व्यवहार अपने से बड़ो और अपने भाइयों के साथ सही नहीं था।

लोगों के दिमाग को बदलने का सबसे आसान तरीका उनके साथ दोस्त बनना होता है, उन्हें आपके सामाजिक समूह में एकीकृत करना है, उन्हें आपके सर्किल में लाना है और फिर वे सामाजिक रूप से त्याग दिए जाने के जोखिम के चलते अपनी मान्यताओं को बदल सकते हैं।

किसी रिश्ते से जुड़ी भावनाएं हमारे दिमाग को पिघला देती हैं, भले ही यह सच्चाई न हो।

यह एक बहुत ही सामान्य घटना है कि अगर कोई आपके तर्क को मानता है, तो आप उस व्यक्ति के लगभग हर विचार के साथ स्वतः ही सहमत हो जाते हैं |

गलत अवधारणाएँ कैसे जीवित रहती हैं ?

गलत अवधारणाएँ और विचार जंगल की आग की तरह फैलते हैं, कोई भी वास्तव में इनकी उत्पत्ति के बारे में नहीं जानता है लेकिन यह निश्चित रूप से जन सामान्य को प्रभावित करते है। कोई भी विचार तब जीवित रहता है जब लोगों वह लोगो के बीच चर्चा में बना रहे । मौन विचार की मृत्यु है, एक ऐसा विचार जो कभी नहीं बोला जाता है या प्रलेखित नहीं होता वह उस व्यक्ति के साथ मर जाता है जिसने इसकी कल्पना की थी।

झूठे विचार लंबे समय तक जीवित रहते है न केवल इसलिए है क्योंकि हम उनका अनुसरण करना पसंद करते हैं लेकिन इसलिए भी की हम उनकी आलोचना करते हैं। हम इसके बारे में शिकायत करने के लिए एक बुरे विचार का बार -2 संदर्भ देते हैं और इस तरह हम इसे सदियों तक जीवित रखते हैं। हम इसे दैनिक जीवन के किसी वायरल पोस्ट या वीडियो के उदाहरण के साथ समझ सकते हैं, जब कुछ गलत हमारे सामने आता है तो हम इसे अनदेखा नहीं करते हैं, बल्कि हम इस पर चर्चा करते हैं और अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं और हम इसे अधिक प्रसिद्ध कर देते हैं।

बौद्धिक श्रेष्ठता आपको प्रतिक्रिया देने के लिए विवश करती है।

लोग हमेशा यह मानते हैं कि जो गलत है उसका उन्हें विरोध करना चाहिए। हमारी बौद्धिक श्रेष्ठता हमें असत्य विचार का सामना करने के लिए प्रेरित करती है और हम मानते हैं कि दुनिया से एक असत्य विचार को कम करना इसे और बेहतर बनाता है। यदि लक्ष्य वास्तव में मानसिकता बदलना है, तो मेरा मानना ​​है कि दूसरे पक्ष की आलोचना करना अच्छा तरीका नहीं है।

हम में से अधिकांश सीखने की ब्जाय जीतने के लिए तर्क का सहारा लेते हैं, जापान के एक प्रसिद्ध लेखक ने लिखा है “हमेशा याद रखें कि बहस करना लिए, और जीतना उस व्यक्ति की वास्तविकता को तोड़ना है जिसके खिलाफ आप बहस कर रहे हैं। अपनी वास्तविकता को खोना किसी के लिए भी दर्दनाक होता है, इसलिए दयालु बनें भले ही आप सही हों ”

सारांश

मनुष्य के रूप में हमे अपनत्त्व की आवश्यकता होती है। हम समाज की आम धारणा प्रणाली को इसलिए स्वीकार करते हैं कि कही अकेले न छूट जाएं। हमारी असुरक्षाएं हमें उन मान्यताओं से जोड़ती हैं, जो समाज के साथ हमें जोड़े रखने के लिए हमारे लिए आरामदायक हैं। व्यक्तिगत भावनाएं हमारी मानसिकता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और हम उन भावनाओं को अपने मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य के खर्च पर भी बरकरार रखना चाहते हैं। हमारे झूठे विश्वास इसलिए जीवित रहते हैं क्योंकि हम उन्हें वांछित या अवांछित रूप से दोहराते रहते हैं। हमारी मानसिकता तर्क के बजाय स्वीकृति के साथ बदलती है।
यही कारण है की मनुष्य जानते बुझते हुए भी भावनाओं में बहकर सुखद असत्य के साथ जुड़ा रहना पसंद करता है।

 

2 thoughts on “मानसिकता पर वास्तविकता की बजाय भावनाएं क्यों प्रभावी होती है  ?

  1. अपने बहुत ही अच्छी जानकारी साँझा की है आपके इस पोस्ट को पढ़कर बहुत अच्छा लगा और इस ब्लॉग की यह खास बात है कि जो भी लिखा जाता है वो बहुत ही understandable होता है.

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